GNLU 16th Convocation: बड़ी संख्या में लॉ स्नातकों का कॉरपोरेट नौकरियां चुनना चिंताजनक है - सीजेआई सूर्यकांत
Press Trust of India | March 1, 2026 | 01:39 PM IST | 2 mins read
सीजेआई सूर्यकांत ने लॉ स्नातकों से वकील के रूप में अपने करियर के शुरुआती दिनों की यादें साझा कीं और उन्हें कानून पढ़ने एवं वास्तविक अदालत कक्ष में वकालत करने के बीच का अंतर समझाया।
नई दिल्ली: भारत के प्रधान न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने कहा कि यदि बड़ी संख्या में लॉ स्नातक अदालतों में वकालत करने के बजाय कॉरपोरेट कंपनियों में नौकरियां करने का विकल्प चुन रहे हैं तो स्थिति चिंताजनक है। न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने अहमदाबाद स्थित गुजरात राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय (जीएनएलयू) के 16वें दीक्षांत समारोह में विधि स्नातकों को संबोधित करते कहा कि कक्षाएं वह नहीं सिखा सकती जो व्यावहारिक अनुभव सिखाता है।
सीजेआई ने कहा, “जैसा कि (GNLU) के कुलपति प्रोफेसर डॉ एस शांताकुमार ने बताया, यदि इस विश्वविद्यालय के द्वार के बाहर आप में से 93 प्रतिशत को कॉरपोरेट संस्थाएं नौकरी पर रख रही हैं तो इससे मेरी चिंता बढ़ जाती है क्योंकि भारतीय न्यायपालिका के एक बहुत स्वार्थी प्रमुख के रूप में मैं यह मानता हूं कि राष्ट्रीय विधि विद्यालय बार और पीठ के अधिक से अधिक सदस्य तैयार करेंगे।”
उन्होंने लॉ स्नातकों से वकील के रूप में अपने करियर के शुरुआती दिनों की यादें साझा कीं और उन्हें कानून पढ़ने एवं वास्तविक अदालत कक्ष में वकालत करने के बीच का अंतर समझाया। सीजेआई सूर्यकांत ने कहा, “अपने अनुभव से, मुझे वकालत के शुरुआती महीने इतनी स्पष्टता से याद हैं कि दशकों बाद भी वे धुंधले नहीं हुए हैं। यह जानकर विशेष रूप से हैरानी होती है कि जिस कानून का आपने इतने ध्यान से अध्ययन किया, वह असल पेशे से केवल आंशिक रूप से ही मिलता-जुलता है।”
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उन्होंने कहा, “पाठ्यपुस्तकों ने आपको सिद्धांत दिए। अब आपके वरिष्ठ आपको समय-सीमाएं देते हैं। कक्षा के दौरान काल्पनिक अदालतों में आप अपने शिक्षक के मार्गदर्शन में रहते हैं लेकिन वास्तविक अदालतों में आपको उन सीमाओं के भीतर बहस करनी पड़ती है जिन्हें आप नहीं चुनते और जिनसे आप संभवत: सहमत भी नहीं हों। यह शिक्षा की विफलता नहीं है। यह तो बस नक्शा (बनाना) सीखने और वास्तविक परिस्थितियों में रास्ता खोजने के बीच का अंतर है।”
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया ने कहा कि वकालत के शुरुआती साल आपको ऐसी बातें सिखाते हैं जो किसी कक्षा में नहीं सिखाई जा सकतीं। प्रधान न्यायाशीध ने कहा, “आप एक शब्द बोले बिना ही पीठ के मिजाज को पढ़ना सीखते हैं। आप यह समझते हैं कि आपके पास जवाब होने से पहले भी एक चिंतित मुवक्किल से कुछ उपयोगी कैसे कहा जाए।”
उन्होंने कहा कि आप यह खोजते हैं कि रिश्ते को नुकसान पहुंचाए बिना किसी वरिष्ठ से असहमति कैसे जताई जाए और कोई मामला हारने पर भी मुवक्किल के मन में यह धारणा कैसे छोड़ी जाए कि उसे नुकसान वकील की उदासीनता के कारण नहीं, बल्कि व्यवस्था के कारण हुआ है। इस कार्यक्रम में गुजरात उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश सुनीता अग्रवाल भी मौजूद थीं।
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